वक़्त की शाखों से लम्हें तोड़ता रहा,
माज़ी के औराक़ यूँ ही जोड़ता रहा |
बातों पे रक़ीब की उन्हें ज्यादा था ऐतबार,
में धीरे-धीरे अपने वादे तोड़ता रहा |
घुट-घुट के मर जाते सारे अरमां सीने में,
मैं एक-एक कर के उन्हें छोड़ता रहा |
ज़माना था, अपनी ही शक्ल मैं ढलता गया,
और मैं था कि शीशों के टुकड़े जोड़ता रहा |
No wrdz !!! simply fab
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