एक और रात आई थी,
तारों की टपरी तले |
वो पिछले रिश्तों की टोकरी में,
कुछ यादें समेट लायी थी |
उसकी आँखों के किनारों से, उस सदी में जा उतरा था,
पत्तों पर से बूँद-बूँद ले कर प्यास बुझाई थी |
अभी-अभी लड़कर, सूरज को बुला लाई है,
उस बात पर जो हमने कल ही तो समझाई थी |
एक और रात आई थी...
Gr8 1 .... waah waah hai ekdum
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