अभी उठोगे और उन आँखों के पार,
उस दुनिया में जा उतरोगे,
सवालों कि भीड़ में बहते-बहते,
चट्टानों से टकराओगे, बिखर जाओगे |
ढूंढोगे एक नई राह और एक शहर बसाओगे,
तुम्हारी सिली हवा कुछ पन्नों को गलाएगी,
एहसास की किरण में बूँदें बादल बनती जायेंगी |
ठहरोगे कहीं फिर पत्तों पर ओस बनकर,
वजूद यही होगा के तुम बिखर जाओगे |
क़तरा ही सही पर बहते रहो,
कहीं कोई सीप तुम्हारा भी इंतज़ार करती होगी |
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