कभी कभी यूँ भी होता है,
ठंडी हतेलियाँ लिए आधी रात को उठ जाता हूँ।
छत पर नक्शे खोजता हूँ,
पर कोई लकीर, कोई पगडंडी वहां तक नहीं जाती।
बस एक याद महकती रहती है कस्तूरी की तरह,
जैसे बारिश की पहली बूंद छोड़ जाती है मिट्टी की सौंधी खुशबू।
ज़ेहन में घूमती रहती है पर हाथ नही आती,
बस एक एहसास होता है,
मोहब्बत मुक़म्मल हुई।