वो शाम के पत्ते से फिसलता हुआ,
बस किनारों पे आ कर रुका था |
अब ना दिन की तपिश उसे ले जाती थी,
और ना रात ही अपने साथ रखेगी उसे,
वो दोनों जुदा होते-होते मिले थे,
और पीछे छोड़ गए थे इसे |
तुमसे कहा था, 'रख लो',
तो मुट्ठियाँ बाँध ली थी तुमने,
मानो हथेली जल ही जायेगी |
में कब तक उसके लिए हवाओं से लड़ता?
सो पेहेन आया हूँ, आँखों में अपनी |
अब ये लम्हा मेरा है...
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