आधी रात से कुछ ऊपर का वक़्त होगा,
जब करवटों ने थक के पलके खोल दीं,
खिड़की से बहार झाँका तो आसमां खुल चूका था,
न जाने कौन से तकिए पर सर रख के बरसता है?
मैं रात भर चाँद के बिस्कुट को गलाता रहा,
उसी चाय के कप मैं, जो उस रात तुमने दी थी,
कई रातें बिता दीं इसको यूँ गलाने की कोशिश मैं,
मुझे उस रात की, आधा ही कप!
चाय दे दो न please....
shabdo me jaan dal di...
ReplyDeleteThanks Himanshu! :)
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