When The Silence Spoke

It was not with the flowers,
Never did those drops have it,
Neither did the walls whisper about it,
Nor from a fine read, nor a hill to tread,
Strings never made that sound,
Not from Mountains, Not from the open grounds,
The brush never really made that stroke,

It was only when The Silence Spoke...

Thursday, March 27, 2025

Mohabbat muqammal huyi

कभी कभी यूँ भी होता है,
ठंडी हतेलियाँ लिए आधी रात को उठ जाता हूँ।
छत पर नक्शे खोजता हूँ,
पर कोई लकीर, कोई पगडंडी वहां  तक नहीं जाती।
बस एक याद महकती रहती है कस्तूरी की तरह,
जैसे बारिश की पहली बूंद छोड़ जाती है मिट्टी की सौंधी खुशबू।
ज़ेहन में घूमती रहती है पर हाथ नही आती,
बस एक एहसास होता है,
मोहब्बत मुक़म्मल हुई।

Tuesday, October 26, 2010

Band Qamara

ख्वाब उड़ते फिरते हें बंद कमरे में मेरे,
ना मैं ही पकड़ पाया इन्हें ना ये कहीं ठहरे|

फिर रात भर हमने इसको बोहोत मनाया,
दिल को फिर याद आए तुम सवेरे-सवेरे|

लेहेरों से पूछो जा कर अब ये कहानी,
हमने रेत पर कितने लफ्ज़ उकेरे|

उस प्यास की भी क्या खूब हस्ती है,
भरे प्यालों से उसने अपने जाम बिखेरे|

Wednesday, September 29, 2010

Hunar

मैं तुझसे सीख लेता हूँ हुनर, गरजने का बरसने का,
कैसे गोद में आओ, कैसे काँधे से टकराओ,
कैसे घटाओं से पिघलो और कैसे बरस जाओ,
उमस दौड़ती फिरती थी सीने में यहाँ - वहाँ,
जो तुम आओ तो अपने साथ मौसम भी ले आओ,
ये बरसता है आज फिर, दीवारें सीली जाती हैं,
जो हाल देखने आओ, तो अब के साथ ले जाओ |

सारे दिन की तपिश पर, ये आज फिर बोहोत बरसा...

Tuesday, September 28, 2010

Seedhi Si Uljhan

मुझे, पाने की जुस्तजू,
तुम्हे, खो जाऊँगा, ये डर |

ना तुमने  जागना छोड़ा,
ना मुझको नींद रात भर,
कितने करीब होते हो,
जब मिलते हो जुदा होकर |

ना तुम ही जान पाए हो,
ना मिलती है मुझे खबर,
ये क्या सीने में चलता है,
ज़रा गिरकर, ज़रा उठकर |

बड़ी सीधी सी उलझन है,
जो मिलती है नहीं मिलकर |

Saturday, September 18, 2010

Ajeeb hoon...

अजीब हूँ,
समंदर लिए फिरता हूँ साथ अपने,
और एक बूँद का प्यासा हूँ|
तारों को बटोरता फिरता हूँ रात भर,
और अज़ान के साथ ही ढल जाता हूँ|
अजीब हूँ ना!

Thursday, September 9, 2010

Rishtey

रिश्ते भी अजीब होते हैं,
जो पास हैं, वो पास नहीं होते,
जो दूर हैं, वो क़रीब होते हैं |

रिश्ते भी अजीब होते हैं...

Lamha (Moment)

वो शाम के पत्ते से फिसलता हुआ,
बस किनारों पे आ कर रुका था |

अब ना दिन की तपिश उसे ले जाती थी,
और ना रात ही अपने साथ रखेगी उसे,

वो दोनों जुदा होते-होते मिले थे,
और पीछे छोड़ गए थे इसे |

तुमसे कहा था, 'रख लो',
तो मुट्ठियाँ बाँध ली थी तुमने,
मानो हथेली जल ही जायेगी |

में कब तक उसके लिए हवाओं से लड़ता?
सो पेहेन आया हूँ, आँखों में अपनी |

अब ये लम्हा मेरा है...