मैं तुझसे सीख लेता हूँ हुनर, गरजने का बरसने का,
कैसे गोद में आओ, कैसे काँधे से टकराओ,
कैसे घटाओं से पिघलो और कैसे बरस जाओ,
उमस दौड़ती फिरती थी सीने में यहाँ - वहाँ,
जो तुम आओ तो अपने साथ मौसम भी ले आओ,
ये बरसता है आज फिर, दीवारें सीली जाती हैं,
जो हाल देखने आओ, तो अब के साथ ले जाओ |
सारे दिन की तपिश पर, ये आज फिर बोहोत बरसा...
No comments:
Post a Comment