When The Silence Spoke

It was not with the flowers,
Never did those drops have it,
Neither did the walls whisper about it,
Nor from a fine read, nor a hill to tread,
Strings never made that sound,
Not from Mountains, Not from the open grounds,
The brush never really made that stroke,

It was only when The Silence Spoke...

Tuesday, October 26, 2010

Band Qamara

ख्वाब उड़ते फिरते हें बंद कमरे में मेरे,
ना मैं ही पकड़ पाया इन्हें ना ये कहीं ठहरे|

फिर रात भर हमने इसको बोहोत मनाया,
दिल को फिर याद आए तुम सवेरे-सवेरे|

लेहेरों से पूछो जा कर अब ये कहानी,
हमने रेत पर कितने लफ्ज़ उकेरे|

उस प्यास की भी क्या खूब हस्ती है,
भरे प्यालों से उसने अपने जाम बिखेरे|

Wednesday, September 29, 2010

Hunar

मैं तुझसे सीख लेता हूँ हुनर, गरजने का बरसने का,
कैसे गोद में आओ, कैसे काँधे से टकराओ,
कैसे घटाओं से पिघलो और कैसे बरस जाओ,
उमस दौड़ती फिरती थी सीने में यहाँ - वहाँ,
जो तुम आओ तो अपने साथ मौसम भी ले आओ,
ये बरसता है आज फिर, दीवारें सीली जाती हैं,
जो हाल देखने आओ, तो अब के साथ ले जाओ |

सारे दिन की तपिश पर, ये आज फिर बोहोत बरसा...

Tuesday, September 28, 2010

Seedhi Si Uljhan

मुझे, पाने की जुस्तजू,
तुम्हे, खो जाऊँगा, ये डर |

ना तुमने  जागना छोड़ा,
ना मुझको नींद रात भर,
कितने करीब होते हो,
जब मिलते हो जुदा होकर |

ना तुम ही जान पाए हो,
ना मिलती है मुझे खबर,
ये क्या सीने में चलता है,
ज़रा गिरकर, ज़रा उठकर |

बड़ी सीधी सी उलझन है,
जो मिलती है नहीं मिलकर |

Saturday, September 18, 2010

Ajeeb hoon...

अजीब हूँ,
समंदर लिए फिरता हूँ साथ अपने,
और एक बूँद का प्यासा हूँ|
तारों को बटोरता फिरता हूँ रात भर,
और अज़ान के साथ ही ढल जाता हूँ|
अजीब हूँ ना!

Thursday, September 9, 2010

Rishtey

रिश्ते भी अजीब होते हैं,
जो पास हैं, वो पास नहीं होते,
जो दूर हैं, वो क़रीब होते हैं |

रिश्ते भी अजीब होते हैं...

Lamha (Moment)

वो शाम के पत्ते से फिसलता हुआ,
बस किनारों पे आ कर रुका था |

अब ना दिन की तपिश उसे ले जाती थी,
और ना रात ही अपने साथ रखेगी उसे,

वो दोनों जुदा होते-होते मिले थे,
और पीछे छोड़ गए थे इसे |

तुमसे कहा था, 'रख लो',
तो मुट्ठियाँ बाँध ली थी तुमने,
मानो हथेली जल ही जायेगी |

में कब तक उसके लिए हवाओं से लड़ता?
सो पेहेन आया हूँ, आँखों में अपनी |

अब ये लम्हा मेरा है...

Chai (Tea)

आधी रात से कुछ ऊपर का वक़्त होगा,
जब करवटों ने थक के पलके खोल दीं,
खिड़की से बहार झाँका तो आसमां खुल चूका था,
न जाने कौन से तकिए पर सर रख के बरसता है?

मैं रात भर चाँद के बिस्कुट को गलाता रहा,
उसी चाय के कप मैं, जो उस रात तुमने दी थी,
कई रातें बिता दीं इसको यूँ गलाने की कोशिश मैं,
मुझे उस रात की, आधा ही कप!

चाय दे दो न please....

Tuesday, September 7, 2010

Main Kaise Bataaun...

मैं कैसे बताऊँ, के तू कौन है, तू क्या है?
खामोश सा कोई शोर है, या बातें करती ख़ामोशी |
सेहरा में खड़ी एक झरने की प्यास,
बहेती हुयी नदी है और सागर की आस |
सब कुछ चाहिए या कुछ भी नहीं,
तितली की ज़िद है, तू है फूलों का एहसास |
आधे चाँद पे लटके लम्हों को पकड़ लेती है,
और सारी रात उनसे झगड़ लेती है |

मेरे ज़हन की खिड़की के बाहर खड़ा,
शरारती आँखों से अन्दर झांकता एक बच्चा है तू |
कुछ एहसास, थोड़ी यादें, थोड़ी नाराजगी, थोड़ी ख़ुशी,
अन्दर फेंकेगा, चीजें बिखराएगा,
और यादों की पोटली हाथ में थमाए, चला जाएगा |

मैं कैसे बताऊँ, के तू कौन है, तू क्या है !
ज़रूरी हो तो रो सके,
ख़ुशी की तू ज़रुरत बन सके,
दुआ है!....

Ek Aur Raat Aai Thee

एक और रात आई थी,
    तारों की टपरी तले |
वो पिछले रिश्तों की टोकरी में,
    कुछ यादें समेट  लायी थी |

उसकी आँखों के किनारों से, उस सदी में जा उतरा था,
    पत्तों पर से बूँद-बूँद ले कर प्यास बुझाई थी |
अभी-अभी लड़कर, सूरज को बुला लाई है,
    उस बात पर जो हमने कल ही तो समझाई थी |

एक और रात आई थी...

Yaad

खाली लम्हों की दस्तक ने ज़हन की कुण्डी बजाई,
हमने तो बस ज़रा सा झाँका था,
वो सारी की सारी चली आई,
दिल के किवाड़ को धक्का दे,
अन्दर जा बैठी है वो,
तनहाई को सजा ही रहे थे,
लो, तम्हारी याद चली आई |

Qatraa

अभी उठोगे और उन आँखों के पार,
उस दुनिया में जा उतरोगे,
सवालों कि भीड़ में बहते-बहते,
चट्टानों से टकराओगे, बिखर जाओगे |
ढूंढोगे एक नई राह और एक शहर बसाओगे,
तुम्हारी सिली हवा कुछ पन्नों को गलाएगी,
एहसास की किरण में बूँदें बादल बनती जायेंगी |
ठहरोगे कहीं फिर पत्तों पर ओस बनकर,
वजूद यही होगा के तुम बिखर जाओगे |
क़तरा ही सही पर बहते रहो,
कहीं कोई सीप तुम्हारा भी इंतज़ार करती होगी |

Humshaql

सो जाओ, कुछ हासिल नहीं है |
इतना सामान कब तक समेटोगे ?
जो जहाँ है, वहीँ रहने दो |
जिसके लिए जुटाया था, वो क्या करेगा अब ?
कुछ दिन हुए वो मर गया,
जिंदा रहने कि कोशिश में |
सुनते हैं किसी दफ्तर में,
एक हमशक्ल मिलता है उसका |
रात बोहोत हो चली है,
सो जाओ, कुछ हासिल नहीं है |

Khamosh Awaaz

खुद के अन्दर खुद कि तलाश हूँ जैसे,
दरिया हूँ और बूँद की प्यास हूँ जैसे |
पा कर मुझे मुझ से खो दोगे तुम,
खामोश सी कोई आवाज़ हूँ जैसे |

Awara Baadal

मेरी फितरत ही बंजारों सी है,
आवारा बादल सा हूँ,
जहाँ प्यास है, वहाँ बरस जाता हूँ |
थमता नहीं, कुछ मांगता भी नहीं,
जो मिल गया वो काफी है,
फिर अपनी प्यास का दामन लिए सरक जाता हूँ |

जब प्यास लगे, तब केहना...

Sawaal

कोई खला हो चाँद के उस पार,
बादल को ओड़ के छुप जाऊं एक बार |
जिंदगी से पूछा बोहोत, पर देती नहीं जवाब,
मैं क्या हूँ, मैं कौन हूँ, कुछ तो बता ए यार!
वक़्त की शाखों से लम्हें तोड़ता रहा,
माज़ी के औराक़ यूँ ही जोड़ता रहा |

बातों पे रक़ीब की उन्हें ज्यादा था ऐतबार,
में धीरे-धीरे अपने वादे तोड़ता रहा |

घुट-घुट के मर जाते सारे अरमां सीने में,
मैं एक-एक कर के उन्हें छोड़ता रहा |

ज़माना था, अपनी ही शक्ल मैं ढलता गया,
और मैं था कि शीशों के टुकड़े जोड़ता रहा |

Pehchaan

जब तक घुली न थी हवा में,
खुशबू ही न थी |
तूने मुझे अपना कहा,
पहचान बन गयी |

Raasta

मैं एक रास्ते सा पड़ा हूँ,
जंगल के बीच-ओं-बीच |
कच्चा सा! एक पगडण्डी बराबर |
हर मौसम मुझे अपनी तरह से सजा लेता है,
हर आता-जाता मुसाफिर मुझे थोडा और खींच देता है,
...किनारों की तरफ |
एक दिन ये किनारे मिल जायेंगे और मैं पूरा हो जाऊँगा,
...इस ओर से उस ओर तक |

Jiye Jaana Bhi Ajeeb Rawaayat Hai...

अजीब सा एहसास है,
कुछ पीछे छोड़ आए हैं, कुछ अपने पास है |
आते-जाते साँसे हमसे खेल जाया करती हैं,
सोचते रहते है क्यूँ जिंदगी हमारे पास है |
जिए जाना भी अजीब रवायत है...

Sunday, September 5, 2010

Just Sailing

Walking down the lonely street,
No where to go.

Lost in open ground on my feet,
Roads all around,
wherever you go.

Faces in the mirror and the mirror of faces,
Nothing to hide,
Nothing to show.

Fallen like autumn leaf, landing on still waters,
No anchors to drop,
No places to row.

Just Sailing...

Main Roz Ek Raat Jalata Hoon

पलकों पर से चुन - चुन कर,
कितने ख्वाब सजाता हूँ ,
कितना कुछ बिखरता है,
मैं कितना कुछ बनाता हूँ |
रोज़ सुबह हो जाती है,
मैं रोज़ एक रात जलाता हूँ |